Wednesday, May 13, 2020
जीवन की गति
जय श्री गणेश
पृथ्वी पर जीव सदैव भीतिरि व् बाहरी शत्रुओ से घिरा रहता है
और यह शत्रु जीव के गुण व् कर्म को प्रभावित करते है
बाहरी शत्रु से भीतरी शत्रु अधिक घातक होता है
क्योकि यह सदैव साथ रहता है और जीवन विकारमय कर देता है
यहाँ तक की यह आत्मा के सत्य को भी प्रभावित करता है जीवन की गति को शीर्ण कर देता है
सर्व प्रथम मानव को भीतिरि शत्रु से बचना चाहिए विपरीत मनस्थिति मानव की प्रबल शत्रु है
एकाग्रता व् ध्यान व् धारण से सर्व प्रथम इस शत्रु से पार पाना परम आवश्यक है
परमात्मा सभी पर कृपा करे
कृपया धन्यवाद