शिव विद्या
एक - ब्रह्म एक है उसी की परिपूर्ण सत्ता है वही पूजनीय हैदो-जीव व् ब्रह्म, ब्रह्म परिपूर्ण है व् जीव की परिपूर्णता ब्रह्म से ही रचित है
तीन-ब्रह्म विष्णु महेश- त्रिदेव
सृष्टी पालन और संघार के कारण करनाये
सत रज तम-त्रिगुण
सुख दुःख व् मोक्ष की सीमा
चार-सत्य- दया- ताप- दान {धर्म के चार पद }
प्रगट धर्म के चार पद कलि मऊ एक प्रदान येन केन विधि दीन्हे दान कराही कल्याण
अर्थ धर्म काम मोक्ष
{मनुष्य जीवन के चार पथ }
पांच-पंच भूत-आकाश अग्नि वायु जल पृथ्वी
पंच भूतो के पाच गुण
शब्द दर्शन स्पर्श रस गंध
पंच कर्म इन्द्रिये
पंच ज्ञान इन्द्रिये
पंच मुखी भगवान् शिव
छह-छह मुखी भगवान् कार्तिकेय
सात- सात प्रकाश पिंड- गृह
सप्त सागर- सात दिन
सप्त धातु
आठ -अष्ट मुखी भगवान् शिव
आठो दिशाओं के अधिष्ठित देव
अष्टांग योग के कारण कारणाय
नो -नव शक्ति नव दुर्गा
नव गृह
भक्ति के नव अंग
शुन्य-पुन आरम्भ